2025-03-26 16:04:28
धीरज रख, मत क्रोध कर, समय बड़ा बलवान। जो बोया वह काटता, जग का यही विधान॥ अपमानों से टूट मत, ख़ुद को रख मजबूत। सब सहकर भी बढ़ चलें, खिलो सदा बेरूत॥ अपने करते वार हो, कैसा उनसे राग। जो ना समझे मन व्यथा, कर दो उनका त्याग॥ तुमको ठुकरा कर चले, उसका क्या अधिकार। जो ना समझे भाव को, उससे क्यों तकरार॥ मोल न जाने शब्द का, नहीं भाव पहचान। उससे क्या संवाद हो, जो करते अपमान॥ मौन बना जो बढ़ चला, पाये मान अपार। बोल-बोल के हारता, करता जो तकरार॥ तिरस्कार की आग में, जलता क्यों हर रोज। मौन रखो, आगे बढ़ो, रख धीरज का ओज॥ शब्दों से मत युद्ध कर, ले इतना संज्ञान। जो ना समझे मूल्य को, उसका क्या सम्मान॥ अपमानों की चोट से, मत रोओ दिन-रात। जो ना जाने प्रेम को, उसकी क्या औकात॥ मौन रहो, गंभीर बन, धैर्य धरो हर हाल। जो असली पहचान ले, मन में उसको पाल॥ मन की पीड़ा मौन कह, शब्द करें उत्पात। जो ना समझे मौन को, उनसे क्या फिर बात॥ सहने वाले को मिले, सच्ची विजय विशाल। क्रोध करेगा जो सदा, होगा वह बेहाल