2025-03-28 21:08:33
सोच-सोच कर दु:ख होता है। चुपके-चुपके मन रोता है। मर्यादा का अंत हो गया, हर पाखंडी संत हो गया।। मंदिर-मस्जिद, क्या गुरुद्वारे। राजनीति के अड्डे सारे। फैशन-ग्लैमर की माया है, सब पर हावी अब काया है।। काया-माया की जय हो। नेताओं के क्या कहने हैं! सोना-चांदी के गहने हैं। माना सारा माल बिकाऊ, लेकिन नेता सभी टिकाऊ।। मार रहा हर शख्स ठगी है। पद पाने की होड़ लगी है। देश-धर्म से किसका नाता, अब कुर्सी ही सबकी माता।। कुर्सी माता की जय हो। घोटालों का जोर बड़ा है। हर दरवाजे चोर खड़ा है। आरक्षण है अब भी जारी, तुष्टीकरण है सब पर भारी।। सभी आग से खेल रहे हैं। गाड़ी पीछे ठेल रहे हैं। भ्रष्टाचारी बल्ले-बल्ले, शिष्टाचारी थल्ले-थल्ले।। भ्रष्टाचारी की जय हो। भूख, गरीबी, लाचारी है। जनता तो बस बेचारी है। सिर पर आज चढी़ महंँगाई, जीयें भी तो कैसे भाई!! लेकिन किसको क्या कहना है! नियति यही है, सब सहना है। यही सदा से होता आया, किसी का फल किसी ने खाया।। भूख-गरीबी की जय हो। भला देश का कौन विचारे! भाग्य देश का कौन संवारे! सभी स्वयं में व्यस्त यहांँ हैं, नाच-गान में मस्त यहांँ हैं।। देश समूचा जेल हुआ है। अपराधों का खेल हुआ है। पुलिस डालती अब तो डाका, हाल बुरा है भारत मांँ का।। भारत माता की जय हो। दिवस शहीदी आज मनाते। बार-बार ताली बजवाते। अब कविता से किसका नाता, दोष मगर है किसका भ्राता!! अब तो कूवे भांँग पड़ी है। किस्मत कविता की बिगड़ी है। हालत ऐसी ठीक नहीं है, पर सच्चाई मीत यही है।। कटु सच्चाई की जय हो।